इस कहानी के दो पात्र है-एक हैं चिंतामणि जी और दूसरे है खुशीराम जी। चिंतामणि जी को हमेशा चिंताएँ परेशान करते है प्रस्तुत पाठ में मनुष्यों को सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए खुशियों का खजाना कैसे प्राप्त कर सकते हैं, यह बताया गया है। एक खुशीराम जी जो हर हाल में प्रसन्न रहते हैं और अपनी सकारात्मक प्रवृत्ति के कारण हर परेशानी सकारात्मक पक्ष ढूँढ़कर खुश हो लेते हैं। दूसरे चिंतामणी जी जो अपनी नकारात्मक सोच के कारण हमेशा चिंताओं से घिरे रहताली हैं। ऐसी चिन्ताएँ जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है। कभी पड़ोसी की खुशियों से परेशान तो कभी अपने काम के बाहर चिंतामग्न । कभी उन्हें अपने स्वास्थ्य की चिंता रहती है तो कभी पुरवाई की । परेशानियों से त्रस्त चिंतामणि जी हमेशा खुन - कृति करते रहते हैं । वहीं खुशीराम जी जैसा नाम से ही स्पष्ट है, हर हाल में प्रसन्न रहते हैं। चाहे उन्हें मानसिक चिंता हो या शारीक्षिणा वे उसे अपने पर हावी नहीं होने देते। अपनी परेशानी का सकारात्मक पक्ष खोजकर, वे उसमें भी खुशी ढूँढ लेते हैं। इसीलिए खुशीराम जी सबसे लोकप्रिय हैं। एक बार खुशीराम जी ने एक बच्चे को सड़क पर अकेला चलते देखा। पीछे से एक गाड़ी तेज रफ्तार से आ रही थी य खुशीराम जी ने छलाँग लगाई और बच्चे को बचा लिया, पर उन्हें काफी चोट आ गई। जब लोग खुशीराम जी से सहानुभूति ब जताने आये तो उन्होंने हँसते-हँसते इस घटना के लाभ बता दिए । उन्होंने एक बच्चे की जान बचाई और उसके माता-पिता को अपार खुशियाँ दीं। दूसरा लाभ इस काम को करके उन्हें बहुत संतोष हुआ और खुशी भी मिली। उन्हें अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ खाली समय मिल गया और अब वे शांति से, एक जिंदगी बचाने का गौरव, जो हमेशा ही उनके साथ जुड़ा रहेगा, जबकि शरीर की चोट समय के साथ ठीक हो जाएगी ।

बच्चे की खातिर अपने शरीर को लहूलुहान कर डाला था। फिर दवाइयों के खर्च का रोना रोते, काम के नुकसान का ढिंढोरा पीटते और अपने दों की दास्तान सुना-सुनाकर आस-पास के लोगों को परेशान कर डालते। सच तो यह है कि खुश रहना हमारे ऊपर निर्भर करता है । लोगों का यह विश्वास है कि खूब सारा धन, अच्छा भोजन, महँगे कपड़े, खूब सारी सुख-सुविधाएँ ही खुशी दे सकते हैं । पर चिंतामणि जी तो यह सब होने पर भी खुश नहीं हैं । तो फिर हमें खुशियाँ कैसे मिल सकती हैं ? खुशी पाने के लिए सबसे जरुरी है सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाना। यदि हम होने वाली हर घटना को सकारात्मक रूप से देखने की आदत डाल लें तो हर हाल में खुश रहने का मूलमंत्र हमारी मुट्ठी में आ जाएगा। सकारात्मक दृष्टिकोण खुशी की पहली सीढ़ी या सोपान है। उदाहरण के लिए दौड़ में पिछड़ जाने का सकारात्मक पक्ष यह है कि हम और अधिक अभ्यास कर अपनी गति को बढ़ाएँ और यह सोचकर निराश न हों कि हम दौड़ में पिछड़ गए । बल्कि यह सोचें कि ऐसी कोई विशेषता हमारे अंदर भी होगी जिससे हम आगे निकल सकते हैं । उस विशेषता को पहचान कर उसे निखारना ही उस घटना का सकारात्मक पक्ष संतुष्ट रहना , खुशी पाने का दूसरा सोपान है । संतुष्ट रहने से लालच, ईर्ष्या, द्वेष, कुंठा, निराशा जैसे भावों से छुटकारा मिल जाता है । किंतु संतुष्ट रहने का यह अर्थ नहीं है कि हम आगे बढ़ने की कोशिश ही न करें । आगे बढ़ते रहना , समय के साथ गतिशील रहना एक स्वाभाविक गुण है जिसके विरुद्ध जाकर न तो हम संतुष्ट रह सकते हैं न ही खुश । खुशियों की प्राप्ति का तीसरा सोपान है - अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश। लगातार कोशिश करके व स्वयं पर विश्वास रखकर, एक मंद गति से चलने वाले कछुए ने तेज दौड़ने वाले खरगोश को भी मात दे दी थी । अपने आप पर विश्वास रख कर , यदि हम कोशिश करते रहेंगे तो कुछ भी असंभव नहीं रह जाएगा और हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ेगा । इस तरह हमारी क्षमता बढ़ेगी और आत्म संतुष्टि से खुशी भी मिलेगी । खुशियाँ दूसरों से बाँटना , खुशी पाने का चौथा सोपान है । जैसे ज्ञान देने से कभी नहीं घटता , वैसे ही खुशियाँ बाँटने से कभी कम नहीं होती । दूसरों को खुशी देने से , हमारा अपना खुशी का खजाना बढ़ता जाता है। दूसरों को खुशियाँ कई प्रकार से दी जा सकती हैं - उनकी भावनाओं का आदर कर , सहानुभूति रखकर , मदद करके और दूसरों के सुख - दुःख में सहभागी होकर । किसी बड़े-बूढ़े को सड़क पार करा देना , बीमारी में सेवा करना , अपनी वस्तुओं को दूसरों में बाँटना , दूसरों को खुशियाँ देकर स्वयं खुशी पाने के कुछ उदाहरण हैं । चिंताओं को अपने ऊपर हावी न होने देना, खुशी पाने का पाँचवाँ सोपान है । चिंताएँ व परेशानियाँ सभी को होती हैं । कुछ लोग चिंतामणि जी की तरह उन्हें अपने ऊपर हावी होने देते हैं और कुछ लोग खुशीराम जी की तरह उस चिंता से मुक्त होने का कारण ढूँढ़ लेते हैं । चिंता मुक्त होने के लिए हमें ही यह निश्चय करना होगा कि हम कैसी प्रवृत्ति को विकसित करें।
हम में हर व्यक्ति के भीतर एक रचनाकार है। उस रचनाकार को पहचानकर अपनी सृजनशीलता को बढ़ाना खुशी पाने का छठा सोपान है। अपनी एक अलग राह खोजकर अपनी पहचान बनाना असीम सुख देता है । क्या चोरी करना भी खुशी दे सकता है ? कभी नहीं । परन्तु अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय चुराकर अपनी मरजी के काम करना खुशी पाने का सातवाँ सोपान है । अपनी मरजी के ये काम-खेलना, नाटक देखना, चित्र बनाना, छायांकन करना , गाने सुनना, भ्रमण करना, बागवानी करना, सैर करना आदि कुछ भी हो सकते हैं । केवल अपने साथ बैठकर अपने हृदय में झाँकना, स्वयं से बातें करना, आत्म-निरीक्षण करना खुशी का आठवाँ सोपान है । स्वयं से बातें करके हम न केवल अपना विश्लेषण कर सकते हैं बल्कि उन बातों को दोहरा भी सकते हैं जिनसे हमने खुशी पाई थी । ऐसे क्षणों में हम दिव्य - स्वप्न भी देख सकते हैं । सपनों को पालने के सुख का अलग आनन्द है और जब हम सपने देखें तभी तो उन्हें पूरा करने की कोशिश भी करेंगे । खुशी प्राप्त करने का नवाँ सोपान है कोई न कोई अच्छा काम करने की ठान लेना । अच्छे कामों की सूची बनाकर , उन पर अमल करना इस दिशा में पहल होगी । दसवाँ और अत्यन्त सोपान है - अपनी खुशी को अपने और अपने परिचितों तक सीमित - रखकर सबको सुख देने का प्रयास करना । जब हम ऐसी भावना को उभारेगे तो पूरी मानव जाति और प्रकृति से प्यार करेंगे । प्राणियों की रक्षा , पर्यावरण संरक्षण , प्राकृतिक संसाधनों –जल , ऊर्जा का संरक्षण , प्रदूषण कम करने का प्रयास , संपूर्ण मानव जाति से समभाव आदि कुछ ऐसे ही कार्य हैं और ये कार्य उच्चतम सुख की प्राप्ति के कारक हैं । तो कमर कसकर , क्यों न खुशीराम जी की तरह अच्छा काम करते हुए खुशियाँ बढ़ाने की राह खोज ली जाए ? यह अच्छा काम हम चाहे रोज करें या सप्ताह में कभी - कभी । पर जब भी मौका मिले , अच्छा काम करें जिससे हमें खुशियों का खजाना खुशी प्राप्ति मिलें ।
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