एक संगीतकार था। उसका नाम झंडेलाल से जाने जाते है। उनकी बीवी को बैंगन बहुत पसंद थे। एक रोज उसने अपने मियां को पुकारा, जानी रे जानी, शायर मियां ने कहां, बोलो मेरी रानी। बीवी चहकी, ‘‘आज तो भुर्ता खाने को मन करनता है। दो-चार बैंगन ले ओओ’’ शायर मियां सिर पर टोपी और कंधे पर झोला डाल चल दिया। थोड़ी ही दूरी पर नदी किनारे एक बाड़ी थी। शायर मियां वहां पहुंच, लेकिन वहां कोई नही था। जब मालिक वहां नही है, तो बैंगन किससे पूछकर लिए जाएं ? शायर मियां ने थोड़ी देर सोचकर तय किया कि मालिक नही है तो न सही, नदी तो है। हमे उसी की इजाजत से लेंगे। शायर मियां बोले, पानी रे पानी, नदी कुछ नही बोली तो वे खुद ही नदी की तरफ से बोले, बोल झंडेलाल जानी। शायर मियां ने पूछा, बैंगन ले लूं देा चार? नदी मौन रही तो उसकी ओर से शायर मियां ने ही फिर कहा, हॉ-हॉ ले लेा न दस बारह।?
शायर मियां ने बड़े बड़े दर्जन-भर बैंगन झोले में डाले और घर पहुंच कर बीवी को दिए। बीवी ने मिच-मसाला डालकर उनका भुर्ता बनाया। दोनों ने साथ बैठकर चटखारे लेते हुए खाया। हफ्ते भर में सारे बैंगन खत्म हो गए। बीवी को बैंगन के भुर्ते को चस्का लग गया। शायर मियां आए-दिन नदी किनारे जाते और बाड़ी में से बैंगन चुराकर ले आते। धीरे-धीरे बाड़ी में बैंगन कम होने लगे। बाड़ी के मालिक सयानेलाल सानी ने सोचा, जरुर कोई चोर बैंगन चुराने आता होगा।
एक रोजन सयानेलाल सवेरा से एक पेड़ की आड़ में छिपकर खड़ा हो गया। घंटे भर बाद शायर मियां झोला लेकिर पधारे औश्र बोले, पानी रे पानी, नदी क्या बोलती? इसलिए उन्होने खुद ही, ‘‘बोलो झंडेलाल जानी, शायर मियां बोले, बैंगन ले लॅू दो चार ? जवाब भी खुद ही ने दिया, हॉ-हॉ ले लो दस-बारह। शायर मियां ने झोला भरकर बैंगन लिए और जैसे ही जाने लगे कि सयानेलाल पेड़ की आड़ में से बाहर निकरल उनके सामने खड़ा हो गया। फिर पूछा, ‘‘किसकी इजाजत से आपने ये बैंगन लिए’’? शायर मियॉ ने मासूमियत से कहा, किसकी इजाजत से ? उस नदी की इजाजत से लिए है।
सयानेलाल ने फिर पूछा ‘‘क्या नदी बोलती है’’ शायर मियॉ बोले, नदी नही बोलती, लेकिन मैं बोलता हॅू, सयानेलाल को गुस्सा आ गया। उसने शायर मियॉ को रस्से से बॉधकर कुऍ में उतारा। कुऍ का पानी थोडे ही बोलेगा। इसलिए सयानेलाल ने खुद ही कहा, बोला सयानेलाल ने पूछा डुबकियॉ खिलाऊॅ दो चार? कुऍ ने बाजए फिर से वही बोला, खिला दो दस-बारह। उसने शायर मियॉ को डुबकियॉ खिलानी शुरु की। वह रस्सा छोड़ता तो शायर मियॉ पानी में उतर जाते और खींचता तो बाहर आ जाते। उसके नाक, कान, मॅुह में पानी भर जाता। वे गिड़गिड़ाने लगे, भैया, मुझे माफ कर दो। अब मैं कभी चोरी नही करुगा। दस डुबकियों के बाद सयानेलाल सानी को दया आ गई। उसने शायर मियॉ को बाहर निकालकार छोड़ दिया। उन्होंने फिर कभी चोरी नही की।

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