ऐसे ही एक क्षेत्र विशेष ‘अरुणाचल प्रदेश’ का वर्णन इस कहानी में किया है।

ahlawat

बहुत पुराने जमाने की बात है। एक प्रदेश में लोग गुफाओ में रहते थे। सबसे पहले किंड्रलालीम और किंचालाली डम ने अपने लिए घर बनाने का निश्चय किया। पर उन्हें घर बनाना तो आता ही नही था। उन दोनों ने जंगली जानवरों से सलाह लेने की सोची। सबसे पहले उन्हें हाथी मिला। हाथी ने उनकी बात सुनकर कहा, ‘‘मकान बनाने के लिए मेरी टॉगों के बराबर मजबूत खंभे बनाओ। ‘‘फिर क्या करे? दोनों ने पूछा। हाथी ने कहा, ‘‘बस मैं इतना ही जानता हॅू। वे दोनों जंगल में और आगे बढ़े। फिर उन्हे एक सांप मिला। सॉप ने उन दोनों की और हाथी की बार सुनकर कहा, ‘‘हाथी की टॉगों के बराबर मजबूत खंभो को जमीन के चारों कोनों पर गाड़ दो और मेरी लंबाई के बराबर की बल्लियों को उनके ऊपर जमा दो’’ ‘‘फिर क्या करे? उन दोनो ने पूछा। बस मै इतना ही जानता हॅू। यह कहकर सॉप बिन में घुस गया। चलते चलते वे औश्र अगे गए। वहां उन्हें एक भैस मिली। उस भैंस के पास एक मरी हई भैंस की हड्डिया का ढॉचा पड़ा था। उन दानेाने ने उसे मकान बनाने की बार और हाथी और सॉप की सलाह बताई। भैंस ने हड्यिों के ढॉचे की ओर इशारा करते हुआ कहा, जैसे यह हड्डियों को ढॉचा है, ऐसी अपने मकान की छत बनाओ।
इसके बाद क्या करना होगा,? दोनों ही बोले। भैंसने उत्तर दिया, मै इतना ही जानती हॅू। वे दोनों वहां से चल पड़े और मछली के पास पहॅुचे। उन्होने मकान की सारी बाते सुनाई। सुनकर मछली बोली, ध्यान से मेरी पीठ की बनावट को देखो। बहुत सही पत्तियॉ जमा करो। और उसे ढॉचे के ऊपर पत्तियों को बिछा दो। पत्तियों को इस होशियारी से बिछाना कि पानी अंदर नही जा सके।
गुफा में आकर किंड्रललीम और किंचालाली डम ने वैसा ही किया जैसी सलाह जानवरों ने दी थी। इस तरह सबसे पहले उन दोनों का मकान बन गया और वे सुख से रहने लगे। जानते हो यह लोक कथा कौन से प्रदेश की है। यह लोक कथा है। अरुणाचल प्रदेश की है। हमारे देश के जिस हिस्से में हर रोज सूरज की पहली किरण पड़ती है। वह अरुणाचल प्रदेश ही है। इसीलिए इसका यह नाम बिलकुल सही है। अरुण सूरज का सारथी और अचल का अर्थ होता है। पहाड़। एक बात और! यहां के लोग सूरज और चॉद की पूजा करते है। इसलिए भी इस प्रदेष का अरुणाचल नाम सही है।

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