इस कहानी में, बेजुबान पक्षी भी संवेदनाएँ रखते है। '

ahlawat

हमारे घर में तीन व्यक्ति रहते है। मॉ, पिता जी और मैं। घरके ऑगन में खूबसूरत सा वृक्ष है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते थे। एक दिन एक गौरैयॉ सीधा घर के अंदर घुस आई। कभी वह किसी रोशनदान पर जा बैठती, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आई थी वैसे ही उड़ भी जाती। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक खने की छत से लगें पंखे के गोले में उन्होनें अपना घर बना लिया है। इस पर पिता जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे। गौरैयों ने नीचे की ओर झॉककर देखा और एक साथ चीं चीं करने लगी। पिताजी को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया और वह बाहर से लाठी उठा लाए। उन्होने लाठी उॅची उठाकर पंखे के गोले को ठोका। चीं चीं करती गौरैयॉ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठी। पिता जी लाठी उठाए पर्दे के डंडे को ओर लपके। एक गौरैया उड़कर रसोईघर पर जा बैठी, दूसरी सीढ़ियो वाले दरवाजे पर।

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मॉ हॅस दी, तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले है और तुम गौरैया को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाजा खुला छोडद्यो, बाकी दजवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेगी। पिता जी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयॉ पर हमला बोल दिया। चीं चीं करती चिड़िया रसोईघर के दरवाजे में से बाहर निकल आई। मॉ तालियॉ बजाने लगी। पिता जी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फुलातए कुर्सी पर आ बैठै

तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। मैने सिर उठाकर ऊपर ओर देखा दोनों गौरैयॉं फिर से अपने घोंसले में मौजूद थी। इस बार वे रोशनदार में से आ गई थी। जिसका एक शीशा टूटा हुआ था। पिता जी ने कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठॅूस दिया। और लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़े दिया। दूसरे दिन इतवाज था। जब हम लोग नीचे उतरकर बैठक में आए तो गौरैयॉ फिर से मौजूद थी। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उसे दिन उन्हे गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नही लगी।

अब तो रोज यही कुछ होने लगा। दि में तो वे बाहर निकाल दी जाती पर रात के समय जब हम से रहे होते तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आती। पिता जी तंग आ गए थे। एक दिन कहने लगे कि गौरैयों को घोंसला नोचकर निकाल देंगें। वह बाहर से स्टूल उठा लाए। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। अब पिता जी लाठी का सिरा घास के निको के उपर रखकर वही रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लबें तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। तभी सहसा जोर की आवाज आई चीं चीं चीं ची

पिता जी के हाथ ठिठक गए। मैंने झट से बाहर की ओर देखा दोनों गौरैयॉ बाहर दीवार पर गुमसुग बैठी थी। फिर पंखे की ओर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से दो नन्ही नन्ही गौरैयॉ चीं ची किय जा रही थी। मानो वे अपना परिचय दे रही थी। हम आ गई है। हमारे मॉ-बाप कहॉ है।
मै उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा कि पिता जी स्टूल पर से नीचे उतर आए और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए। इस बीच मॉ ने सभी दरवाजे खोल दिए उनके मॉ बार झट से उड़कर अंदर आ गए। और चीं चीं करते उनसे जा मिले। माद गौरैया उनकी नन्ही नन्ही चोंचो से चुग्गा डालने लगी। कमरे से फिर से शोर होने लगा था। पर इस बार पिजा जी उनकी ओर देख देखकर केवल मुस्कराते रहे।

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