यह एक कहानी है। अकबरी का लोटा हास्य-प्रधान है।

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लाला झाऊलाल को खाने-पीने की कमी नहीं न थी। अच्छा खाते थे। अच्छा पहनते थे। पर ढाई सौ रुपये तो एक साथ आँख सेंकने के लिए भी न मिलते थे।
ठसलिए जब उनकी पत्नी ने एक दिन एकाएक ढाई सौ रुपयों की माँग पेश की तब उनका जी एक बार जोर से सनसनाया और फिर बैठ गया। उनकी यह दशा देखकर पत्नी ने कहा-
‘‘डरिए मत, आप देने में असमर्थ हो तो मैं अपने भाई से माँग लूँ?’’
लाला झाऊलाल तिलमिला उठे। उन्होने रौब के साथ कहा-‘‘अजी हटो, ढाई सौ रुपये के लिए भाई से भीख माँगोगी, मुझसे ले लेना।’’
‘‘लेकिन मुझे इसी जिदंगी में चाहिए।’’

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लाला झाऊलाल ने रौब के साथ खडे होते हुए कहा, ‘‘आज से सातवें दिन मुझसे ढाई सौ रुपये ले लेना। ’’
लेकिन जब चार दिन ज्यों त्यो में यों ही बीत गए और रुपयों का कोई प्र्रबधं न हो सका तो उन्हे चिंता होने लगी। प्रश्न अपनी प्रतिष्ठा का था, अपने ही घर में अपनी साख का था। देने का पक्का वादा करके अगर अब दे न सके तो अपने मन में वह क्या सोचेगी?
खैर एक दिन और बीता। पाँचवे दिन घबराकर उन्होने पं. बिलवासी मिश्र को आनी विपदा सुनाई। संयोग कुछ ऐसा बिगडा़ था कि बिलवासी जी भी उस समय बिल्कुल खुक्ख थे। उन्होने कहा, ‘‘ मेरे पास हैं तो नहीं पर मै कही से माँग जाँचकर लाने की र्कोशश करुँगा और अगर मिल गए तो कल शाम को तुमसे मकान प मिलूँगा।
वही शाम आज थी। हफ्ते का अंतिम दिन। कल ढाई सौ रुपये या तो गिन देना है या सारी हेकडी़ से हाथ धोंना है।
आज शाम को पं. बिलवासी मिश्र को आना था। यदि न आए, या कहीं रुपये का प्रबधं वे न कर सके तो ? इसी उधेड़-बुन में पडे लाला झाऊलाल छत पर टहल रहे थे। कुछ प्यास मालुम हुई उन्होने नौकर को आवाज दी। नौकर नहीं था। खुद उनकी पत्नी लेकर आई।
वह पानी तो जरुर लाई पर गिलास लाना भूल गई थी। केवल लोटे में पानी लिए वह प्रकट हुइ। फिर लोटा भी संयोग से वह, जो अपनी बेढगी सूरत के कारण लाला झाऊलाल को सदा से नापसंद था। था तो नया साल दो साल का ही बना हुआ, पर कुछ ऐसी गढन उस लोटे की थी कि जैसे उसका बाप डमरू और माँ चिलम रही हो।
लाला ने लोटा ले लिया बोले कुछ नही अपनी पत्नी का अदब मानते थे। फिर उन्होने यह भी सोचा कि लोटे में पानी दे तब भी गनीमत है, अभी अगर चूँ कर देता हूँ तो बाल्टी में भोजन मिलेगा।तब क्या करना बाकी रह जाएगा ?
लाला अपना गुस्सा पीकर पानी पीने लगे। उस समय वे छत की मुँडेर के पास ही खडे थे। जिन बुजुर्गा ने पानी पीने के संबंध में यह नियम बनाए थे। कि खडे खडे पानी न पियो सोते समय पानी न पियो दौडने के बाद पानी न पियो, उन्होने पता नहीं कभी नियम बनाया या नहीं कि छत की मुँडेर के पास खडे होकर पानी न पियो। जान पड़ता है, कि इस महत्वपूर्ण विषय पर उन लोगें ने कुछ नहीं कहा है।
लाला झाऊलाल मुश्किल से दो-एक घूँट पी पाए होगे कि न जाने कैसे उनका हाथ हिल उठा और लोटा छूट गया।
लोटे ने दाँए देखा न बाँए वह नीचे गली की ओर चल पडा। अपने वेग से उल्का को लजाता हुआ आँखो से ओझल हो गया। किसी जमाने में न्यूटन नाम के किसी खुराफाती ने पृथ्वी की आकर्षण शक्ति् नाम की एक चीज ईजाद की थी। कहना न होगा कि यह सारी शक्ति इस समय लोटे के पक्ष में थी।
लाला को काटो तो बदन में खून नहीं। ऐसी चलती हुई गली में ऊँचे तिमंजिले से भरे लोटे का गिरना हँसी-खेल नही। यह लोटा न जाने किस अनाधिकारी के झोपडें पर काशीवास का संदेश लेकर पहुँचेगा।
कुछ हुआ भी ऐसा ही। गली में जोर का हल्ला हो उठा। लाला झाऊलाल जब तक दौड़कर नीचे उतरे तब तक एक भारी भीड उनके आँगन में घुस आई।
लाला झाऊलाल ने देखा कि इस भीड में प्रधान पात्र एक अंग्रेज है जो नखशिख तक भीगा हुआ है और जो अपने एक पैर को हाथ से सहलाता हुआ दूसरे पैर नाच रहा है। उसी के पास अपराधी लोटे को भी देखकर लाला झाऊलाल जी ने फौरन दो और दो जोड़कर स्थिति को समझ लिया।
गिरने के पूर्व लोटा एक दूकान के सायबान से टकराया। उस दूकान पर खडे़ एक अंग्रेज को उसने सांगोपाग स्नान कराया और फिर उसी के बूट पर आ गिरा।
उस अंग्रेज को जब मालूम हुआ कि लाला झाऊलाल ही उस लोटे के मालिक है। तब उसने केवल एक काम किया अपने मुँह को खोलकर खुला छोड दिया। लाला झाऊलाल को आज ही मालूम हुआ, कि अंग्रेजी भाषा में गालियों का ऐसा प्रकाड कोष है।
इसी समय पं. बिलवासी मिश्र भीड को चीरते हुए आँगन में आते दिखाई पडे। उन्होने आते ही पहला काम यह किया, कि उस अंग्रेज को छोडकर और जितने आदमी में घुस आए थे। सबको बाहर निकाल दिया फिर आँगन में कुर्सी रखकर उन्होने साहब से कहा, ‘‘आपके पैर में शायद कुछ चोट आ गई है। अब आप आराम से कुरसी पर बैठ जाइए।’’
साहब बिलवासी जी को धन्यवाद देते हुए बैठ गए और लाला झाऊलाल की ओर इशारा करके बोले ‘‘आप इस शख्स को जानते हे। ?’’
‘‘बिल्कुल नही। और मैं ऐसे आदमी को जानना भी नहीं चाहता जो निरीह राह चलतों पर लोटे के वार करे।’’
‘‘मेरी समझ में ‘ही इज ऐ डेंजरस क्रिमिनल’ (यह एक खजरनाक मुजरिम है)।’’
परमात्मा ने लाला झाऊलाल की आँखे को इस समय कहीं देखने के साथ खाने की भी शक्ति दे दी होती, तो यह निश्चय है, कि अब तक बिलवासी जी को वे अपनी आँखो से खा चुके होते। वे कुछ समझ नहीं पा रहे थे, कि बिलवासी जी को इस समय क्या हो गया है। ?
साहब ने बिलवासी जी से पूछा, ‘‘तो क्या करना चाहिए ?’’

The next part of this story will come soon.

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